मंज़िलें
ये जो मंज़िलें है सामने
इनकी तो कभी चाहत भी ना थी,
वो तो बस हम ही है
जो रास्ता भूल के आये हुए है ।
मर्ज़ इश्क़ का मुकम्बल कैसे हुआ
ये या तो आशिक़ बताता है
या उसका जनाज़ा
ये इश्क़ की किताबें
कब किसने जानी है
जितनी इसमे आग उतना ही पानी है
रंग से उतर जाता है
खून आंखों में
ना खाई चोट तो क्या जवानी है!
ज़िंदगी से जंग में मची है आर-पार
इनकी तो कभी चाहत भी ना थी,
वो तो बस हम ही है
जो रास्ता भूल के आये हुए है ।
मर्ज़ इश्क़ का मुकम्बल कैसे हुआ
ये या तो आशिक़ बताता है
या उसका जनाज़ा
ये इश्क़ की किताबें
कब किसने जानी है
जितनी इसमे आग उतना ही पानी है
रंग से उतर जाता है
खून आंखों में
ना खाई चोट तो क्या जवानी है!
ज़िंदगी से जंग में मची है आर-पार
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